अल्मोड़ा-उत्तरांचल फैडरेशन ऑफ मिनिस्टीरियल सर्विसेज एसोसिएशन के पूर्व कुमाऊं मण्डल नैनीताल अध्यक्ष व पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष फैडरेशन धीरेन्द्र कुमार पाठक ने प्रैस को जारी एप बयान में कहा कि स्थानांतरण एक्ट 2017 लागू 2018 में तमाम विसंगतियां है जिसे सरकार व शासन दूर नहीं कर रहे हैं जिससे एक्ट पर ही सवालिया निशान उत्पन्न हो रहे हैं। स्थानांतरण एक्ट के तहत स्थानांतरण की तीन श्रेणी बनाई गई है पहले अनिवार्य स्थानांतरण के तहत सुगम से दुर्गम फिर अनुरोध इसके बाद तीसरे नंबर पर दुर्गम से सुगम स्थानांतरण को धकेला गया है अब सवाल यह उठता है कि जब स्थानांतरण अनिवार्य है तो फिर तीसरे नंबर पर किस आधार पर धकेल दिया गया है। अनिवार्य स्थानांतरण को पहले निपटाया जाना चाहिए उसके बाद अनुरोध के आधार पर स्थानांतरण होने चाहिए उसमें भी विभिन्न प्रकार की कैटेगरी है। 2018 से यह विसंगति दूर नहीं हुई है जबकि स्थानांतरण एक्ट में ही पहले अनिवार्य और फिर अनुरोध की बात कही गई है लेकिन क्रियान्वयन के समय दुर्गम से सुगम को तीसरे पर धकेल दिया गया है। यह भारी विसंगति है। इसके अतिरिक्त अशासकीय विद्यालयों में कार्यरत पति पत्नी होने पर उन्हें स्थानांतरण का लाभ व एक जगह स्थानांतरण का लाभ नहीं दिया जा रहा है यह भी गंभीर विसंगति है।पति पत्नी में से एक राजकीय सेवा में है और दूसरा अशासकीय सेवा में है तो उन्हें भी एक जगह स्थानांतरण की सुविधा नहीं है।उत्तरांचल पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन उत्तराखंड जनपद अल्मोड़ा के अध्यक्ष डा मनोज कुमार जोशी द्वारा इसे गंभीर विसंगति बताया और विसंगति दूर करने की मांग की गई है।उत्तरांचल फैडरेशन ऑफ मिनिस्टीरियल सर्विसेज एसोसिएशन के पूर्व कुमाऊं मण्डल नैनीताल अध्यक्ष व पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष फैडरेशन धीरेन्द्र कुमार पाठक ने बताया कि इतनी गंभीर विसंगति होने पर भी सरकार व शासन कोई भी इसमें निर्णय नहीं ले रहे हैं जबकि यह संविधान का भी उल्लंघन है और समानता अधिकार का भी उल्लंघन है।अनिवार्य स्थानांतरण को दो अलग अलग तराजू से नहीं तोल सकते और इस प्रकार दुर्गम से सुगम में वापसी या दुर्गम में कार्यकाल पूरा होने पर वापसी की संभावना 15 फीसदी स्थानांतरण के तहत नगण्य हो रही है।इस गंभीर विसंगति को दूर किया जाना चाहिए बार बार अनुरोध के बाद भी शासन स्तर से कार्यवाही नहीं हो रही है। सरकार एक्ट की विसंगतियों को हल करने में पूरी तरह असफल हो रही है। धारा 27 के तहत होने वाले स्थानांतरण भी विभागाध्यक्ष के माध्यम से वार्षिक स्थानांतरण के समय ही निपटाया जाना चाहिए ताकि अनावश्यक सचिवालय में फाइल घूमती न रहें और सभी में काउंसलिंग किया जाना चाहिए।प्रमाण पत्रों में दो सौ मीटर दायरे के तहत बार बार लाभ देने का कोई औचित्य नहीं है सरकार व शासन लाभ देना चाहते हैं तो फलित रिक्त पदों पर भी स्थानांतरण होने चाहिए और इन स्थानांतरण में भी अनिवार्य रूप से काउंसलिंग होनी चाहिए। दुर्गम में रहने की अवधि पूर्ण होने पर कार्मिक दुर्गम में रहने को बाध्य है और सुगम में फलित पद रिक्त हैं यह भी गंभीर विसंगति है तथा इससे भी अन्य कार्मिकों के हितों पर कुठाराघात हो रहा है ।एक्ट को सौ फीसदी लागू किया जाए तभी इसके लाभ सभी को प्राप्त होगा अन्यथा 15 फीसदी स्थानांतरण को एक्ट का नाम दिया जाना सिवाय धोखे के और कुछ भी नहीं है।उत्तराखंड सरकार व शासन को गंभीरता से विचार करना चाहिए।विसंगति दूर नहीं होने पर माननीय उच्च न्यायालय में चुनौती देने पर भी विचार किया जायेगा। छोटे से राज्य में अधिकारियों द्वारा मनमानी नीति बनाना और उसका औचित्य स्पष्ट नहीं होगा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। धीरेन्द्र कुमार पाठक पूर्व अध्यक्ष फैडरेशन कुमाऊं मण्डल नैनीताल व पूर्व सचिव एजुकेशनल मिनिस्ट्रीयल आफीसर्स एसोसिएशन कुमाऊं मण्डल नैनीताल ने कहा कि उत्तराखंड में नियमों व शासनादेश में पारदर्शिता का अभाव है जिसमें विसंगति उत्पन्न हो रही है और शासनादेश बनाते समय पूर्व शासनादेश का भी अध्धयन करना जरूरी है।मुख्य प्रशासनिक अधिकारियों को वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के पद पर पांच वर्ष की सेवा राजपत्रित पद पर होने पर भी आहरण वितरण अधिकार से वंचित रखना दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।विभाग में नियुक्त होने के बाद सभी कार्मिकों को अनिवार्य प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।बिलों के निस्तारण के दृष्टिगत बिलों के कालातीत की अवधि एक वर्ष के स्थान पर दो वर्ष करनी चाहिए।मुख्य प्रशासनिक अधिकारी टेचन कुमार प्रजापति ने बताया कि वर्ष 2017 से ही मुख्य प्रशासनिक अधिकारियों के कार्य व उत्तरदायित्व व आहरण वितरण अधिकार के लिए संघर्षरत है लेकिन शासन स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।जब विभाग द्वारा राजपत्रित अधिकारी का सम्मान दिया गया है तो अधिकार भी दिए जाने चाहिए।धीरेन्द्र कुमार पाठक ने सभी गंभीर विसंगति की समीक्षा कर दूर करने की मांग की है।उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव को भी पत्र लिखा गया है।उत्तराखंड में वास्तविक कार्य संस्कृति का लोप होना दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है मामलों को लटकाए रहना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है सभी संगठनों को हर महीने निर्धारित तिथि को वार्ता के लिए बुलाया जाना चाहिए न कि वार्ता के लिए अनुरोध के लिए शासन की दया पर निर्भर रहे।
