
अल्मोड़ा-कांग्रेस के नगर महामंत्री एवं नगर निगम पार्षद वैभव पांडे ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा दिए जा रहे खेत बचाओ और खलियान बचाओ के नारों पर सवाल उठाते हुए भाजपा सरकार पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया है।उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार खेतों और पर्यावरण संरक्षण की बातें करती है वहीं दूसरी ओर उसकी नीतियां प्राकृतिक संसाधनों, जंगलों और पहाड़ों को कॉर्पोरेट हितों तथा खनन माफियाओं के हवाले करती दिखाई देती हैं।
जारी बयान में पांडे ने कहा कि देशभर में विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हो रही है और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में अदालतों को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।उन्होंने राजस्थान की अरावली पर्वतमाला का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां अवैध खनन और पहाड़ों के कटान के मामलों में सुप्रीम कोर्ट को सख्त रुख अपनाना पड़ा है। अरावली जैसी महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला के संरक्षण को लेकर लगातार चिंताएं जताई जाती रही हैं।उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तराखंड में भी धामी सरकार पर लगातार खनन प्रेमी सरकार होने के आरोप लगते रहे हैं।प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ती खनन गतिविधियों के कारण पर्यावरणीय नुकसान, नदी क्षेत्रों के दोहन और पहाड़ों की स्थिरता पर खतरा बढ़ रहा है।उनका कहना है कि सरकार की नीतियों का खामियाजा आम जनता,किसान और ग्रामीण क्षेत्रों को भुगतना पड़ रहा है।वैभव पांडे ने कहा कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पहाड़ी राज्य में जंगलों की कटाई और बड़े प्रोजेक्ट्स के कारण पर्यावरणीय दबाव लगातार बढ़ रहा है।इसके चलते भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं,खेती प्रभावित हो रही है और जंगली जानवर गांवों की ओर रुख कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि किसान वर्षों से बंदर,जंगली सूअर और अन्य वन्यजीवों के आतंक से जूझ रहे हैं लेकिन सरकार अब तक कोई प्रभावी समाधान प्रस्तुत नहीं कर पाई है।उन्होंने सरकार से सवाल किया कि किसानों की फसलों और खेत-खलिहानों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए उसकी स्पष्ट और सफल नीति क्या है।यदि सरकार इतने वर्षों में कोई ठोस समाधान नहीं दे सकी है तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में खेत-खलिहान बचाना चाहती है तो उसे केवल मंचों से नारे देने के बजाय जंगलों,पहाड़ों और जल स्रोतों के संरक्षण के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने होंगे। उन्होंने कहा कि जनता अब समझ चुकी है कि केवल भाषणों से पर्यावरण नहीं बचता।एक हाथ से संरक्षण की बात करना और दूसरे हाथ से प्रकृति के दोहन को बढ़ावा देना भाजपा सरकार के दोहरे चरित्र को उजागर करता है।
