बागेश्वर-जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, कोसी कटारमल अल्मोड़ा के जैव विविधता संरक्षण एवं प्रबंधन केंद्र की ओर से उत्तराखंड के विभिन्न विद्यालयों में 2 से 8 अक्टूबर तक वन्यजीव सप्ताह मनाया जा रहा है।इसी क्रम में संस्थान के शोधार्थियों की टीम ने जनपद बागेश्वर के विक्टर मोहन जोशी स्मारक राजकीय इंटर कॉलेज बागेश्वर तथा जवाहर लाल नेहरू इंटर कॉलेज शामा में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए। कार्यक्रम में दोनों विद्यालयों के 250 से अधिक विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने प्रतिभाग किया।कार्यक्रम की शुरुआत संस्थान के शोधार्थी डॉ. बसंत सिंह ने की।उन्होंने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए वन्यजीवों के इतिहास,उनके महत्व तथा संरक्षण की आवश्यकता पर विद्यार्थियों के साथ महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।उन्होंने कहा कि वन्यजीव केवल जंगलों तक सीमित नहीं हैं,बल्कि वे संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।इनके संरक्षण के बिना पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना संभव नहीं है।इसके बाद संस्थान के शोधार्थी डॉ. कुलदीप जोशी ने इस वर्ष की वन्यजीव सप्ताह की थीम “Connecting habitats, thriving wildlife” पर विद्यार्थियों को विस्तार से जानकारी दी।उन्होंने बताया कि वन्यजीवों के सुरक्षित आवास उनके अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी हैं। यदि उनके प्राकृतिक आवासों को संरक्षित किया जाए तो आसपास की पारिस्थितिकी भी अधिक समृद्ध और संतुलित बन सकती है।उन्होंने बताया कि संस्थान के कार्यकारी निदेशक डॉ. आई डी भट्ट के दिशा-निर्देशन में विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से हिमालयी क्षेत्रों में जैव विविधता संरक्षण एवं पर्यावरण से जुड़े कार्य किए जा रहे हैं।विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण में उनकी भूमिका के प्रति भी जागरूक किया गया।कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए डॉ. विभाष ध्यानी ने वन संसाधनों के सतत उपयोग एवं प्रबंधन पर विद्यार्थियों को जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जंगल मानव जीवन के साथ-साथ वन्यजीवों के लिए भी जीवन का आधार हैं।इसलिए वन संसाधनों का उपयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए, जिससे वर्तमान जरूरतें पूरी होने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित रह सकें।उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि वन संसाधनों के संतुलित एवं सतत उपयोग के माध्यम से वन्यजीवों के आवासों को भी सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके लिए स्थानीय समुदायों और युवाओं की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया गया।संस्थान की शोधार्थी प्रशस्ति साह एवं कनिष्का रौतेला ने विद्यार्थियों को बताया कि संस्थान द्वारा हिमालयी क्षेत्रों की जैव विविधता का विस्तृत डेटाबेस तैयार किया जा रहा है। उन्होंने विद्यार्थियों से अपने-अपने क्षेत्रों में मौजूद वनस्पतियों,वन्यजीवों एवं अन्य जैव विविधता से संबंधित जानकारियां संस्थान द्वारा उपलब्ध कराई गई ई-मेल आईडी के माध्यम से साझा करने का आग्रह किया।उन्होंने बताया कि स्थानीय स्तर से प्राप्त ऐसी जानकारियों को एकत्र कर हिमालयी जैव विविधता के डेटाबेस को और मजबूत किया जा सकता है।भविष्य में इस जानकारी को मोबाइल ऐप से जोड़ने की भी योजना है, जिससे आम लोगों और विद्यार्थियों को अपने आसपास की जैव विविधता के बारे में जानकारी उपलब्ध हो सकेगी।कार्यक्रम के दौरान दोनों विद्यालयों के प्रधानाचार्यों ने जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान की ओर से संचालित जागरूकता कार्यक्रमों की सराहना की। उन्होंने कहा कि कार्यान्वयन विज्ञान, संचार विज्ञान और पर्यावरण जागरूकता से जुड़े ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों को प्रकृति और जैव विविधता के प्रति संवेदनशील बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।प्रधानाचार्यों ने भविष्य में इस प्रकार के कार्यक्रमों को और व्यापक स्तर पर आयोजित करने का आग्रह किया, ताकि सुदूर ग्रामीण एवं पर्वतीय क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक भी वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचाई जा सके।कार्यक्रम के समापन से पूर्व भारतीय वन्यजीव बोर्ड द्वारा वन्यजीवों के संरक्षण एवं संवर्धन तथा उनके प्रति नागरिकों के दायित्व पर आधारित वन्यजीव संरक्षण की प्रतिज्ञा दिलाई गई।विद्यालयों में उपस्थित शिक्षक-शिक्षिकाओं एवं विद्यार्थियों ने वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का संकल्प लिया।इस अवसर पर विद्यार्थियों को संदेश दिया गया कि प्रकृति और वन्यजीवों का संरक्षण केवल सरकारी संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे प्रयासों और जनभागीदारी से हिमालयी जैव विविधता को सुरक्षित रखने की दिशा में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

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