नैनीताल-आज प्रैस को जारी एक बयान में उत्तरांचल पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन उत्तराखंड के प्रदेश उपाध्यक्ष धीरेन्द्र कुमार पाठक ने कहा कि हाथी के दांत दिखाने के और और खाने के और ही होते हैं।ठीक इसी प्रकार की राज्य सरकार की नीतियों पर भी गंभीर प्रश्न चिन्ह लग रहा है। एक्ट के अनुसार समूह ख श्रेणी के अधिकारियों को गृह जनपद नहीं मिलेगा।ऐसी स्थिति में अधिकांश कार्मिक इस श्रेणी में आते आते 50 पार हो जाते हैं सीधी नियुक्ति को छोड़कर।अब जो व्यक्ति 50 के बाद मैदानों में ऊतरेगा तो निश्चित ही रूप से पलायन को ही बढ़ावा मिलेगा।लेकिन राज्य सरकार को इस बात से कोई इत्तेफाक नहीं।जो सदस्य अपने गृह जिले में रहना चाहते हैं उन्हें बाहर पदोन्नति का कोई औचित्य नहीं है। सरकार को एक्ट की पुनः समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है।जिला प्रशासन को छोड़कर अन्य सेवा संवेदनशील नहीं है ऐसी स्थिति में सभी को लपेटना राज्य के नीति निर्धारकों पर भी सवाल उठाता है। पलायन आयोग बनाकर काम नहीं चलेगा बल्कि हकीकत में भी फैसले लेने होंगे।सरकार को हर हाल में समीक्षा की आवश्यकता है।उत्तरांचल पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष धीरेन्द्र कुमार पाठक द्वारा एक्ट में संशोधन करने के लिए सरकार का ध्यानाकर्षण हेतु यह बात कही है।फारगो नियमावली को भी निरस्त करने की आवश्यकता है।सभी जनपदों में साठ प्रतिशत स्थान सुगम व चालीस प्रतिशत स्थान दुर्गम स्थान अनिवार्य रूप से घोषित करने की आवश्यकता है।पदोन्नति पर मैदानी क्षेत्रों को वैकल्पिक रखना चाहिए ताकि पर्वतीय क्षेत्रों में रहने के इच्छुक कार्मिकों को बढ़ावा मिल सकें।धीरेन्द्र कुमार पाठक द्वारा नई नियुक्ति के बाद अनिवार्य रूप से प्रशिक्षण दिये जाने पर बल दिया गया।उन्होंने कहा कि नई नियुक्ति में दुर्गम के साथ साथ सुगम क्षेत्रों का भी विकल्प खुला रखना चाहिए।राज्य सूचना आयोग में अपील के स्थान पर पूर्व की भांति वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से अपील की सुनवाई हो ताकि अनावश्यक खर्च पर भी रोक लग सके।सरकार को सभी मांगों पर विचार करने की आवश्यकता है ताकि कार्मिकों में असंतोष दूर हो सकें।मुख्य प्रशासनिक अधिकारियों का गजट नोटिफिकेशन व कार्य व उत्तरदायित्व का प्रख्यापन शासन स्तर से नीचे होने पर रोष व्याप्त है और आहरण वितरण अधिकार भी मुख्य प्रशासनिक अधिकारियों को मिलने चाहिए।
