अल्मोड़ा-वन पंचायतो को यदि ग्राम पंचायतों के अधीन किया गया तो वह अपना अस्तित्व खो देंगे,जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है यह बात उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी ने यहां जारी एक बयान में कही। तिवारी ने कहा कि वन पंचायतें का इतिहास काफी गौरवशाली रहा है जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत के साथ एक लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया गया था।राज्य बनने के बाद भाजपा व कांग्रेस दोनों ही सरकारों ने समय समय पर नियमावली बदलकर वन पंचायतों को कमजोर करने का काम किया।इधर वन मंत्री द्वारा दिए गए बयान जिसमें उन्होंने वन पंचायत को ग्राम पंचायत के अधीन किए जाने की बात कही हैं से स्पष्ट हो गया है कि वर्तमान सरकार वन पंचायत जैसी लोकतांत्रिक व संवैधानिक संस्था को समाप्त करने की साजिश रच रही हैं जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।इससे पूर्व 2024 में वन पंचायत नियमावली में संशोधन कर राज्य परामर्श दात्री समिति में लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आने वाले सरपंच की व्यवस्था समाप्त कर उसके स्थान पर सरपंचों को मनोनीत करने की व्यवस्था दी गई।उन्होंने आगे कहा कि राज्य बनने के बाद वन पंचायत नियमावली में चार बार संशोधन किया जा चुका है।इन संशोधनों के जरिए वन पंचायत की स्वायतता को कमजोर कर उनमें वन विभाग का अत्यधिक हस्तक्षेप बढ़ा दिया गया है।उन्होंने वन पंचायत की मजबूती के लिए जन पक्षीय वन पंचायत अधिनियम बनाए जाने की मांग की।उन्होंने कहा कि वन मंत्री के बयान से वन पंचायत प्रतिनिधियों एवं उत्तराखंड की बेहतरी के लिए संघर्षरत सामाजिक राजनीतिक संगठनों में जबरदस्त आक्रोश है। उन्होंने भाजपा व कांग्रेस पर उत्तराखंड की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाते हुए कहा कि दोनों ही सरकारों ने भू माफिया की भूमिका में रहकर जमीनों को बेचने का काम स्वयं किया है।कहा कि वन पंचायतों के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ उत्तराखंड में व्यापक जन आंदोलन शुरू किया जाएगा।

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