अल्मोड़ा-यहां आयोजित प्रेस वार्ता में उत्तराखण्ड जन स्वास्थ्य संघर्ष मोर्चा ने प्रदेश में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के लिए सरकार की नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया।वक्ताओं ने सरकार और विभागीय मंत्री की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 2014 में अल्मोड़ा में पहाड़ की चिकित्सा सेवाओं की दुर्दशा को लेकर ऐतिहासिक आंदोलन हुआ था। उसके परिणामस्वरूप न केवल अल्मोड़ा में हार्ट केयर यूनिट की स्थापना हुई थी,बल्कि अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज के निर्माण को भी गति मिली थी। उन्होंने बताया कि उस समय जनपद के विभिन्न दलों और संगठनों ने एकजुट होकर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री के समक्ष राज्य की चिकित्सा सेवाओं को सुधारने हेतु कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे, परंतु उन पर गंभीरता से अमल नहीं किया गया।वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान में चौखुटिया क्षेत्र में चल रहे आंदोलन को मोर्चा पूर्ण समर्थन देता है और सरकार से मांग करता है कि क्षेत्र की सीएचसी की मांग को तत्काल पूरा किया जाए।मोर्चा ने पूर्व में भी प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण मांगें उठाई थीं, जिनमें प्रमुख रूप से राज्य में चिकित्सा क्षेत्र से संबंधित समस्याओं पर ज़िलेवार निर्धारित समय में जनसुनवाई आयोजित की जाए। पूरे स्वास्थ्य तंत्र को सम्मिलित कर एक स्वतंत्र न्यायिक आयोग की स्थापना की जाए।प्रत्येक विकासखण्ड अथवा क्षेत्र में मॉडल चिकित्सालयों की स्थापना की जाए।चिकित्सा जैसे सेवा क्षेत्र में निजीकरण व व्यवसायीकरण को समाप्त किया जाए।चिकित्सा ढांचे में नौकरशाही पदों की बजाय कार्मिक पदों की संख्या बढ़ाई जाए।निर्धारित मानकों के अनुसार जनता को चिकित्सक एवं चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं।चिकित्सा क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और अराजकता पर प्रभावी नियंत्रण किया जाए आदि थी।वरिष्ठ आंदोलनकारी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं मोर्चा संयोजक पी.सी. तिवारी ने कहा कि सरकार को प्रदेश की चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री एनआरसी जैसे अन्य कानूनों और मॉडल पर पहल कर सकते हैं, तो उत्तराखण्ड से एक आदर्श स्वास्थ्य नीति बनाकर उस पर कार्य क्यों नहीं किया जा सकता?उन्होंने कहा कि पलायन आयोग ने भी शिक्षा के साथ स्वास्थ्य को उत्तराखण्ड में पलायन का प्रमुख कारण माना था, लेकिन सरकार आज भी गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा व स्वास्थ्य सेवाएं देने में असफल है,धौलादेवी विकासखण्ड में हाल की मौतें पूरी तरह स्वास्थ्य सेवाओं की लापरवाही से जुड़ा मामला हैं,जिनमें विभागीय मंत्री का नैतिक रूप से इस्तीफा या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए थी।ये घटनाएं स्वस्थ भारत मिशन पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।उन्होंने कहा कि दवा उद्योग, कुछ निजी चिकित्सालयों और राजनीतिक रसूखदारों की मिलीभगत से पूरा स्वास्थ्य तंत्र जकड़ा हुआ है। मेडिकल कॉलेज भी धीरे-धीरे रेफरल सेंटर में बदलते जा रहे हैं। करोड़ों रुपये खर्च कर सीएचसी और जिला चिकित्सालयों की इमारतें तो खड़ी की जा रही हैं, लेकिन राज्य में न तो पर्याप्त चिकित्सक हैं।उन्होंने यह भी कहा कि आज चौखुटिया क्षेत्र के ग्रामीणों को अपनी पीड़ा बताने के लिए पैदल देहरादून जाना पड़ रहा है, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।वक्ताओं ने कहा कि प्रदेश, विशेषकर पहाड़ों में सामान्य चिकित्सा के लिए न तो सरकार की इच्छा शक्ति दिखती है, न ही कोई सुदृढ़ ढांचा। स्वास्थ्य क्षेत्र में हज़ारों युवा अल्प वेतन पर ठेके में कार्य कर रहे हैं, जिससे उनका भविष्य असुरक्षित है, जबकि विभाग के ऊपरी स्तर पर अधिकारियों की भारी भरकम फौज बैठी है। आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें जनता की सेवा और उपचार के कार्यों में लगाया जाए।उन्होंने कहा कि पहाड़ों से मरीजों, खासकर घायलों को हल्द्वानी, बरेली या दिल्ली तक ले जाना ग्रामीणों की नियति बन चुकी है। बड़ी संख्या में प्रसव कराने वाली महिलाएं भी इसी कठिनाई से जूझ रही हैं।वक्ताओं ने कहा कि सरकार जनता के स्वास्थ्य को केवल खान-पान, जीवनशैली और पर्यावरण जैसे घटकों से जोड़कर नहीं देखती। यदि सरकार वास्तव में इन पहलुओं पर ध्यान देती, तो राज्य में चिकित्सा का बोझ अपने आप कम हो जाता। दुर्भाग्य से सरकार का ध्यान पेयजल, पोषण और स्वच्छता से अधिक शराब के प्रसार की ओर केंद्रित है, जो जनस्वास्थ्य के लिए अत्यंत चिंताजनक है।इस अवसर पर उपपा के केंद्रीय अध्यक्ष पी सी तिवारी, केंद्रीय उपाध्यक्ष आनंदी वर्मा, केंद्रीय महासचिव एडवोकेट नारायण राम, मोहम्मद साकिब, मोहम्मद वसीम, नगर अध्यक्ष हीरा देवी, ममता जोशी, ममता बिष्ट, भारती पांडे, भावना पांडे, पुष्कर सिंह बिष्ट, राजू गिरी आदि लोग उपस्थित रहे।

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