बागेश्वर-उत्तराखंड के अधिकांश क्षेत्रों में चैत्र संक्रांति के आगमन से फूलदेई का त्योहार मनाने की परंपरा है।कुमाऊं और गढ़वाल के ज्यादातर इलाकों में आठ दिनों तक यह त्योहार मनाया जाता है।वहीं टिहरी के कुछ इलाकों में एक माह तक भी यह पर्व मनाने की परंपरा है।इसी प्रकार का फूलदेई त्यौहार दीया ग्रुप के द्वारा बागेश्वर जिले के कपकोट में बच्चों के साथ मनाया जिसमें बच्चों को फूलदेई पर्व के बारे में बताया तथा चली आ रही परंपरा के बारे में बताया।इसके साथ ही उन बच्चों के अनुभवों को भी जाना,जब छोटे समय में फूल डालने जाया करते थे तो किस प्रकार तरह-तरह के गीत गाया करते थे।बच्चों ने भी बढ़-चढ़कर इसमें हिस्सा लिया और अपने अपने अनुभव को दीया ग्रुप के सामने साझा किया।उन्होंने बताया कि वह किस प्रकार से फूल डालने जाते थे और गुड़- चावल को इकट्ठा करके लाते थे।इसके साथ ही यह भी बताया कि गुड़ चावल जब मिक्स हो जाता था तो शाम को चावल और गुड़ का भात बनाया जाता था।जिसको कुमाऊनी भाषा में साय या साए कहते हैं।इसी कार्यक्रम में दीया ग्रुप में बच्चों से अपनी संस्कृति और सभ्यता से जुड़ी हुई परंपरा को आगे बढ़ाने का आवाहन किया और यह दृढ़ संकल्प किया कि वे आने वाले समय में फूलदेई त्यौहार को पूरे उत्साह के साथ मनाने के लिए आने वाली पीढ़ी को प्रेरित करेंगे।कार्यक्रम के उपरांत दीया ग्रुप ने बच्चों को गुड़ व टॉफियां बांट कर उनको प्रोत्साहित किया कि वे इस प्रकार की संस्कृति को अपनाएं।कार्यक्रम के अवसर पर अखिलेश चौहान,गंगा सिंह बसेड़ा, नंदन सिंह बसेड़ा,जीवन दानू,दयाल दानू,विनोद जोशी,ख्याली जोशी,रेनू टाकुली आदि के साथ दीया ग्रुप के सदस्य उपस्थित रहे।अंत में सभी की सुख व शांति की प्रार्थना करते हुए सामुहिक रूप इस इस गीत को आया।
फूलेदई,छम्मा देई,दैणी द्वार,भरी भकार,ये देली स बारंबार नमस्कार, पूजैं द्वार बारंबार,फूले द्वार जिसका तात्पर्य है कि आपकी देहरी (दहलीज) फूलों से भरी और सबकी रक्षा करने वाली (क्षमाशील) हो,घर व समय सफल रहे,भंडार भरे रहें,इस देहरी को बार-बार नमस्कार,द्वार खूब फूले-फले।
