अल्मोड़ा- ग्रीन हिल्स ट्रस्ट की ओर से आयोजित ‘वारि विमर्शः जल पर चर्चा’ श्रृंखला का चौथा संस्करण आयोजित किया गया, जिसमें वनाग्नि और जलवायु परिवर्तन के अंतर्संबंधों पर विशेषज्ञों और प्रबुद्ध नागरिकों ने विस्तार से विचार-विमर्श किया। वक्ताओं ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते पारिस्थितिकी संकट पर चिंता जताते हुए जल और जंगल के संरक्षण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई। कार्यक्रम की शुरुआत में ट्रस्ट की सचिव डॉ. वसुधा पंत ने विषय की गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि तेजी से बढ़ते मरुस्थलीकरण के खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते जल और जंगल के संबंधों को नहीं समझा गया तो भविष्य में जल संकट और गंभीर हो जाएगा। मुख्य अतिथि प्रभागीय वन अधिकारी प्रदीप धौलाखंडी ने जलवायु परिवर्तन और तकनीकी उपायों की भूमिका पर चर्चा करते हुए बताया कि वर्ष 2024 वनाग्नि के लिहाज से चुनौतीपूर्ण रहा, हालांकि इस वर्ष बेहतर मौसमीय परिस्थितियों के चलते आग पर नियंत्रण में सफलता मिली है। उन्होंने मानव-वन्यजीव संघर्ष को भी पारिस्थितिकी असंतुलन का परिणाम बताया। मुख्य वक्ता गजेंद्र कुमार पाठक ने शीतलाखेत मॉडल का उदाहरण देते हुए कहा कि पारिस्थितिकी के बिना अर्थव्यवस्था की कल्पना संभव नहीं है और जंगलों के संरक्षण में समाज की भागीदारी अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि वनाग्नि के लिए केवल चीड़ को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है, बल्कि मानवीय लापरवाही भी एक बड़ा कारण है। साथ ही उन्होंने विदेशी प्रजातियों के बढ़ते प्रभाव और वन पंचायतों को सशक्त बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व विधायक कैलाश शर्मा ने की, जबकि महापौर अजय वर्मा, प्रोफेसर नीरज पंत और डॉ. दुर्गापाल विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे। वक्ताओं ने वनों के संरक्षण को जन-आंदोलन का रूप देने की आवश्यकता पर बल दिया। इस दौरान वन विभाग के अधिकारी, कर्मचारी, विभिन्न विद्यालयों के छात्र-छात्राएं और शहर के बुद्धिजीवी वर्ग मौजूद रहे। आयोजन में डॉ. वसुधा पंत के साथ दीपक जोशी, भूषण पांडे, तनुजा सहित अन्य सदस्य सक्रिय रहे।
