अल्मोड़ा-गोल्डन कार्ड को लेकर कर्मचारियों क्षौर सेवानिवृत्त कर्मचारियों में रोष बढ़ता ही जा रहा है।उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी गोल्डन कार्ड की स्वीकार्यता अस्पतालों में नहीं होने के कारण कार्मिकों व शिक्षकों व सेवानिवृत्ति प्राप्त कार्मिकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।स्टेट गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम के तहत अलग अलग दरों 450, 650,1100 के हिसाब से हर महीने वेतन से कटौती हो रही है किन्तु जब कार्मिकों द्वारा इस कार्ड को लेकर अस्पताल में जाया जा रहा है तो वे इस कार्ड से इलाज कराने में असमर्थता व्यक्त कर रहे हैं ऐसी स्थिति में कार्मिक अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।सरकार को इस बात को गंभीरता से लेना चाहिए या तो इस कार्ड से इलाज हो या फिर पुरानी चिकित्सा प्रतिपूर्ति बहाल करनी चाहिए लोकतंत्र में कार्मिकों को ठगने की व्यवस्था बंद करनी चाहिए।स्वास्थ्य ऐसा विषय है कि इसे मजाक में नहीं लेना चाहिए कई गंभीर प्रकृति के रोगी है वे दर दर भटक रहे हैं ऐसी स्थिति में निर्णय लेने की आवश्यकता है।सरकार के द्वारा जारी कार्ड को स्वास्थ्य के निजी अस्पताल व सरकारी क्षेत्र में नहीं माना जाता है तो यह गंभीर सवाल खड़े करता है क्या बिना आंदोलन के उत्तराखंड के सरकार के समझ में कोई बात नहीं आती है।उत्तरांचल फैडरेशन ऑफ मिनिस्टीरियल सर्विसेज एसोसिएशन कुमाऊं मण्डल नैनीताल के अध्यक्ष धीरेन्द्र कुमार पाठक ने बताया कि हर रोज कार्मिकों द्वारा इस कार्ड की विसंगतियों के बारे में बताया जा रहा है तथा इसके लागू नहीं होने पर पुरानी चिकित्सा प्रतिपूर्ति व्यवस्था बहाल करने की मांग की जा रही है ऐसी स्थिति में जब कार्ड की स्वीकार्यता नहीं है तो इस योजना को बंद कर देना चाहिए और अब तक की कटौती को वापस कर देना चाहिए।लगातार सरकार व शासन के संज्ञान में लाया गया है किन्तु इस पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।फैडरेशन के कुमाऊं मण्डल के सचिव सौरभ चंद द्वारा भी विसंगतियों को दूर करने या फिर पुरानी व्यवस्था बहाल करने की मांग की है।जिला अध्यक्ष अल्मोडा सी एस नैनवाल व जिला मंत्री पुष्कर सिंह भैसोड़ा द्वारा भी इस संबंध में कार्मिकों के हितों के दृष्टिगत निर्णय लेने की मांग की गई है।मंडलीय अध्यक्ष धीरेन्द्र कुमार पाठक द्वारा कहा गया है संवाद हीनता,वादाखिलाफी व मनमानी हठधर्मिता उत्तराखंड में चरम स्थिति में है श।इन परिस्थितियों के कारण सरकारी नीतियां कारगर नहीं हो रही है।इस बात को आज की तिथि में सभी समझते हैं कि कार्ड कोई नहीं ले रहा है फिर भी सब ख़ामोश है।जिन कार्मिकों का कार्ड नहीं बना है उनकी भी जबरन वेतन से कटौती हो रही है और कोई लाभ नहीं मिल रहा है उत्तराखंड के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।सरकार को या तो इस कार्ड को सरकारी व निजी क्षेत्र दोनों में लागू करना चाहिए या फिर पुरानी चिकित्सा प्रतिपूर्ति की व्यवस्था को बहाल करना चाहिए। सरकार की गोल्डन कार्ड की स्वीकार्यता नहीं होने के कारण स्वयं सरकार भी कठघरे में है।