अल्मोड़ा-मकर संक्रांति के अवसर पर कुमाऊँ अंचल में परंपरागत घुघुतिया या उत्तरायणी पर्व पूरे श्रद्धा, उल्लास और लोक परंपराओं के साथ मनाया गया।यह पर्व उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी मान्यताओं का जीवंत प्रतीक माना जाता है।मकर संक्रांति के दिन सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ उत्तरायण की शुरुआत होती है।इसे ऋतु परिवर्तन,नई फसल और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।इसी अवसर पर कुमाऊँ क्षेत्र में घुघुतिया पर्व मनाने की परंपरा है, जिसकी पहचान पारंपरिक मीठे पकवान घुघुत से जुड़ी है। गेहूं के आटे,गुड़ और घी से बनाए जाने वाले घुघुत विभिन्न आकृतियों में तैयार किए जाते हैं और बच्चों के गले में माला की तरह पहनाए जाते हैं।पर्व की सुबह बच्चे घरों की छतों और आंगनों में जाकर कौवों को बुलाते हैं और पारंपरिक स्वर में कहते हैं काले कौवाकाले घुघुति माला खाले।इसके बाद कौवों को घुघुत खिलाए जाते हैं।यह दृश्य हर वर्ष पर्व की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत कर देता है। घुघुतिया पर्व से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा कुमाऊँ क्षेत्र में प्रचलित है।मान्यता है कि एक समय राजा के छोटे पुत्र को मंत्री ने षड्यंत्र के तहत जंगल में मरवाने की योजना बनाई थी, लेकिन जंगल में कौवों के शोर मचाने से ग्रामीण वहां पहुंच गए और राजकुमार की जान बच गई। इस घटना के बाद कौवों के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए उन्हें मीठे घुघुत खिलाने की परंपरा शुरू हुई जो आगे चलकर घुघुतिया पर्व के रूप में स्थापित हो गई।एक अन्य मान्यता के अनुसार कौवा पितरों का प्रतीक माना जाता है।ऐसे में उन्हें भोजन अर्पित करना पूर्वजों के सम्मान और उनके आशीर्वाद से जुड़ा हुआ माना जाता है।यही कारण है कि यह पर्व केवल एक लोक उत्सव नहीं,बल्कि श्रद्धा,करुणा और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश भी देता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *