अल्मोड़ा-उत्तरांचल पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन उत्तराखंड जनपद अल्मोड़ा के सचिव धीरेंद्र कुमार पाठक द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि उत्तराखंड सरकार द्वारा कार्मिक शिक्षक संगठन के साथ लगातार वादाखिलाफी की जा रही है और अब संगठनों में भी संघर्ष करने की इच्छा नहीं रही इसके कारण भी कोई भी मांग पूर्ण नहीं हो रही है।डी ए जैसे बुनियादी बातों पर आजकल आजकल करके कई महीने निकाल दिये गये है जो कि वचनबद्ध है।उत्तराखंड अधिकारी कर्मचारी शिक्षक समन्वय समिति द्वारा अक्टूबर 22 में हड़ताल स्थगित करके मांगों के सभी दरवाजे बंद कर दिए हैं। उसके बाद फैडरेशन द्वारा भी बिना पदाधिकारियों व सदस्यों को विश्वास में लिए अप्रत्याशित रूप से 21 सूत्रीय मांगों पर बिना शासनादेश के हड़ताल स्थगित कर दी। कुछ उपलब्धि पूर्व में रही है तो बार बार उसका दृष्टांत देकर भी संगठन नहीं चल सकता है वर्तमान परिस्थितियों को तो देखना ही होगा। दस वर्ष पहले क्या मिला और आज समर्पण की स्थिति क्यों है इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।उसके बाद की स्थिति देखिये सब अपने आप स्पष्ट हो जायेगा। कोई भी पदाधिकारी सरकार को बिना शासनादेश के अभिवादन करने पहुंच जायेंगे तो सरकार तो सब समझ रही है कि संगठन भी सरकार की कृपा से ही चलेंगे और किसी भी मांग पर सार्थक दृष्टिकोण नहीं है।शिथिलीकरण का मुद्दा जो चुनावी वर्ष होने के कारण 6 महीने बाद दिया गया अब सरकार ही स्पष्ट करें कि दो महीने के भीतर आचार संहिता लागू हो जाएगी किस प्रकार सभी विभागों में पदोन्नति होगी। किसी भी विभाग द्वारा अभी तक शिथिलीकरण शासनादेश जारी होने के बाद अपने कार्यालयों को सर्कुलर जारी नहीं किया और न ही विभागों की सूची जारी हो रही है कि रिक्त पदों के सापेक्ष कहां तक सदस्यों को लाभ मिलेगा।आखिर यह प्रदेश किस प्रकार के मापदंड स्थापित करने की तैयारी में है। माह मई 24 के बाद पदोन्नति की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है क्योंकि सरकार ने हाईकोर्ट में अवगत कराया है कि 6 माह के भीतर नगर निकाय के चुनाव भी करा लिए जायेंगे।अब इन परिस्थितियों में कौन सा जादू हो जायेगा कि पदोन्नति सभी हो जायेगी क्योंकि नगर निकाय के लिए फिर से प्रदेश में भी आचार संहिता लागू होगी। दो दो आचार संहिता में सब ठप्प।यह शिथिलीकरण को जुलाई में ही दे देना चाहिए था।अब सरकार ने जो शासनादेश निकाल उसमें जुलाई 23 से जून 24 तक का उल्लेख किया है लेकिन निकाला दिसंबर 23 में है यानि 6 महीने सरकार व शासन ही लील गये। शर्मशार करने वाली स्थिति है। इस उत्तराखंड को बनाने के लिए कार्मिको शिक्षकों द्वारा 3 माह की हड़ताल की गई और आज डी ए के भी लाले पड़ गए।शीर्ष पदाधिकारियों को अपनी रणनीति की समीक्षा करनी होगी।सरकार की चौखट पर दम तोड़ने से अच्छा होगा कि संघर्षरत रहते हुए जीवन दे दिया जाय।सभी को एकजुट होना होगा जो यह समय निकल रहा है यह सभी सदस्यों पर भी भारी पड़ रहा है और शीर्ष पदाधिकारियों द्वारा अघोषित चुप्पी साध ली है।बैठकों में जोर दिखाने के बजाय सरकार के कार्यालय में दरी बिछाकर कुछ दो शब्द भी कहें जायेंगे तो असरदार होंगे। धरना प्रदर्शन आंदोलन अनशन ये सब संगठन के आभूषण होते हैं जिस भी समाज में इनका लोप हो जाता है वहां फिर सरकार का उत्पीड़न हो जाता है वह दिखाई दे रहा है और उत्तराखंड का हर कार्मिक महसूस कर रहा है। एस्मा कोई नयी बात नहीं है अगर सभी कार्मिक अपनी मांगों के लिए लामबंद हो जायेंगे और धरातल पर भी शत् प्रतिशत योगदान देंगे तो सरकार को भी झुकना पड़ा है।पुरानी पेंशन बहाली,संशोधित ए सी पी व मुख्य प्रशासनिक अधिकारियों को गृह जनपद वापसी,आहरण वितरण अधिकार प्रदान करना कार्य व उत्तरदायित्व का प्रख्यापन सुगम से सुगम स्थानांतरण की अनुमति व सभी मांगों के समाधान का कार्मिक इंतजार कर रहे हैं लेकिन सरकार वादाखिलाफी कर रही है।जब सरकार वादाखिलाफी कर रही है तो संगठनों को भी लामबंद होकर संघर्ष करना चाहिए।वर्तमान परिदृश्य इसी ओर इशारा कर रहा है अन्यथा उत्तराखंड में संगठनों का इतिहास ही रह जायेगा तो कोई नयी बात नहीं होगी।
