अल्मोड़ा-प्रैस को जारी एक बयान में उत्तरांचल पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष धीरेंद्र कुमार पाठक ने कहा कि उत्तराखंड में मांगों को पूरा करने के बजाय आवाज ही न निकालने की सलाह दी गई है।जिस राज्य के लिए 94 दिन शिक्षक,कार्मिक हड़ताल पर रहे उसी राज्य में इस तरह के आदेश दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।उन्होंने कहा कि महानिदेशक विद्यालयीय शिक्षा उत्तराखंड ने आज विद्यालयीय शिक्षा विभाग के अंतर्गत कार्यरत अधिकारी,शिक्षक,कार्मिकों के साथ ही विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों को सोशल साइट्स एवम दैनिक समाचार पत्रों में बयान देने पर रोक लगाई गई है।जो लोकतंत्र का अपमान है।उन्होंने कहा कि सरकार का यह आदेश कर्मचारी संगठनों के अस्तित्व पर ही प्रहार है। कार्मिक संगठनों द्वारा मांगों के निस्तारण के लिए शासनादेश की मांग की जाती है और धरना प्रदर्शन आंदोलन हड़ताल आदि की जाती है।भारतीय लोकतंत्र में लोकतांत्रिक व्यवस्था का यही मूल आधार है। विभाग को अपना आदेश वापस लेना चाहिए। भारतीय संविधान का भी यह आदेश अवमानना करता है।भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था है और अपने मांगों के समर्थन में बयान देना मांग पत्र प्रस्तुत करना संगठनों का अधिकार है।

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