हल्द्धानी-उत्तरांचल पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन उत्तराखंड के प्रदेश उपाध्यक्ष धीरेन्द्र कुमार पाठक द्वारा कहा गया है कि उत्तराखंड की सरकारों द्वारा लगातार कार्मिक विरोधी फैसले लेकर कार्मिक संगठनों के अस्तित्व पर चोट पहुंचाने का काम किया गया है। पहले पुरानी पेंशन बंद कर दी गई फिर ए सी पी 10-16-26 के स्थान पर 10-20-30 कर दी गई।इसके बाद चिकित्सा प्रतिपूर्ति की धनराशि जो बिना धनराशि कटौती के ही उपलब्ध थी अब1000 ,650,450-250, कटौती के बाद उपलब्ध नहीं है। सरकार द्वारा भी दिया गया गोल्डन कार्ड चलने की स्थिति में नहीं है। शिथिलीकरण 30-6-22 तक ही अनुमन्य किया गया और अब विस्तार नहीं किया जा रहा है।चिकित्सा प्रतिपूर्ति महत्त्वपूर्ण विषय था उसकी भी मज़ाक बना दी गई है और करोड़ों रूपया प्रतिमाह सभी शिक्षको कार्मिकों के वेतन से कटौती कर राजकोष में जबरन डाला जाता है जिसका गोल्डन कार्ड बना और जिसका नहीं भी बना है उसके भी वेतन से कटौती हो रही है।सैकड़ों प्रत्यावेदन चले गए हैं कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं है क्योंकि वेतन से तो कटौती हो रही है बाकी सरकार को पता है कि हो क्या रहा है।चिकित्सा प्रतिपूर्ति भी हाथ से जा रही है।राज्य सरकार द्वारा ढोल नगाड़े बजाकर सरीखा कहा गया है कि हमने उत्तराखंड में स्थानांतरण एक्ट लागू कर दिया है लेकिन राज्य सरकार के हर विभाग के अधिकारियों द्वारा इसे अपने मन से इंप्लीमेंट किया जा रहा है।अनिवार्य स्थानांतरण व अनुरोध के आधार पर स्थानांतरण में मनमानी की जा रही है।सदस्यों को पहला,दूसरा विकल्प नहीं देकर सातवां,आठवां विकल्प दिया जा रहा है आखिर पहला विकल्प किसे दिया जायेगा इसे भी कोई स्पष्ट करने को तैयार नहीं है।सभी नियमानुसार कार्यवाही के लिए एक दूसरे को लिख रहे हैं।एक्ट आज तक सौ फीसदी लागू नहीं किया गया और सारे सुगम के स्थान खाली होने की स्थिति में है जब एक्ट लागू नहीं करना था तो फारगो नियमावली को सौ फीसदी क्यों लागू किया जा रहा है। सरकार को चाहिए कि हर जनपद में साठ प्रतिशत स्थान सुगम व 40 प्रतिशत स्थान दुर्गम घोषित करने चाहिए।कोटि करण के मानकों में संशोधन होना चाहिए।सरकार द्वारा रही सही कसर वेतनमानों को डाउनग्रेड करने की कोशिश कर दी गई है।कहा जा रहा है कि भारत सरकार में जो वेतनमान दिये गये है वह ही राज्य सरकार में दिये जायेंगे।सरकार भूल रहीं हैं कि वेतन के साथ साथ जो भत्ते केन्द्र सरकार में अनुमन्य है वह राज्य सरकार में नहीं है।कार्मिक संगठनों द्वारा एक महीने हड़ताल करने के बाद केवल पदनाम ही ले पाये।वेतनमान भी बाद में मिले।वेतनमान डाउनग्रेड करने पर सेवा संरचना का ढांचा गड़बड़ हो जायेगा और आज तक जो भी प्राप्त किया गया सब रसातल पर पहुंच जायेगा।तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा सोच समझकर नीतिगत निर्णय लिया गया है उसको चुनौती देने का मतलब ही कार्मिकों शिक्षकों के सभी के साथ खिलवाड़ करना है और कार्मिकों द्वारा इसका पुरजोर विरोध किया जायेगा।कुछ मांगे स्वीकार करने के बजाय एक के बाद एक दनादन कार्मिक शिक्षक विरोधी फैसले लिए जा रहे हैं जो कि उत्तराखंड के लिए ख़तरनाक संकेत है।मिनिस्ट्रीयल संवर्ग में मुख्य प्रशासनिक अधिकारी को गृह जनपद से बाहर करने का कोई औचित्य नहीं है।यह पद संवेदनशील नहीं है और इस के कार्य व उत्तरदायित्व व गजट नोटिफिकेशन भी जारी नहीं किया गया है।कार्य व उत्तरदायित्व भी शासन से प्रख्यापित नहीं है ऐसी स्थिति में राजपत्रित पद की सम्मान की क्या उम्मीद की जा सकती है।मुख्य प्रशासनिक अधिकारी को जनपद से बाहर पदोन्नति करने का फैसला राज्य सरकार ने वापस लेना चाहिए।सभी मुख्य प्रशासनिक अधिकारी को जनपद में जाने का स्वैच्छिक विकल्प लेते हुए उनके प्रत्यावेदन के आधार पर फैसला लेना चाहिए।सरकार से अनेक संवर्गोफार्मासिस्ट,वाहन चालक, मानचित्र कार पुलिस उपनिरीक्षक, कांस्टेबल,मिनिस्ट्री यल संवर्ग में वेतनमान डाउनग्रेड करने की सिफारिश कर्मचारी विरोधी समिति द्वारा की गई है जिसका पुरजोर विरोध किया जायेगा।सरकार के कार्मिक विरोधी प्रस्तावों से इससे आने वाले नये कार्मिकों व कार्यरत में जमीन आसमान का अंतर हो सकता है और भविष्य में पदोन्नति किस प्रकार से होगी यह भी यक्ष प्रश्न बना रहेगा। उत्तराखंड बनाने के लिए संघर्षरत रहे शिक्षकों कार्मिकों को उत्तराखंड सरकार अपना ऐसा भी रूप दिखायेगी सोचा न था।सरकार को गंभीरता से विचार कर सभी कार्मिक विरोधी फैसले वापस लेने चाहिए।एजुकेशनल मिनिस्ट्रीयल आफीसर्स एसोसिएशन जनपद अल्मोड़ा के अध्यक्ष व उत्तरांचल फैडरेशन ऑफ मिनिस्टीरियल सर्विसेज एसोसिएशन जनपद अल्मोड़ा के अध्यक्ष पुष्कर सिंह भैसोड़ा द्वारा भी सभी कर्मचारी विरोधी फैसले वापस लेने की मांग की गई है उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले लेने से कार्मिकों का मनोबल टूट रहा है। उत्तरांचल पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन के जिला अध्यक्ष डॉ मनोज कुमार जोशी द्वारा भी सरकार को प्रांत द्वारा प्रेषित सभी मांगों पर कार्यवाही करने की मांग की गई है और वेतनमानों को डाउनग्रेड करने की सिफारिशों को नहीं मानने पर जोर दिया है।उन्होंने कहा कि इससे कार्मिक संगठन को संघर्ष के बाद मिली सफलता पर पानी फिर जाएगा। धीरेन्द्र कुमार पाठक प्रदेश उपाध्यक्ष द्वारा कहा गया है कि सरकार को अपने सभी शिक्षक कार्मिक विरोधी फैसले की समीक्षा करनी चाहिए और ग़लत फैसलों को वापस लेना चाहिए अन्यथा फिर आंदोलन झेलने को भी तैयार रहना चाहिए जो कर्मचारी राज्य बनाने के लिए तीन महीने हड़ताल पर रह सकते हैं तो अपने अपने संवर्ग के हितों की रक्षा के लिए भी संघर्ष कर सकते हैं।सरकार को एक्ट में विकल्प के स्थान पर सभी मामलों अनिवार्य व अनुरोध के आधार पर स्थानांतरण सहित में काउंसलिंग करनी चाहिए ताकि अधिकारियों की मनमानी खत्म हो।फूट डालो और राज करो की नीति के स्थान पर प्राकृतिक न्याय के आधार पर कार्य करने की संस्कृति को भी विकसित करने की आवश्यकता है। सरकार द्वारा मनमाने फैसले वापस नहीं लिए गए तो उत्तराखंड में आने वाले भविष्य में बड़ा आंदोलन होगा जिसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी भी शासन व सरकार की ही होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *